पाली शहर में अन्नकूट, जिसे 56 भोग का प्रसाद भी कहा जाता है, की परंपरा लगभग 70 वर्षों से चली आ रही है। यह परंपरा मुख्यत: दक्षिण भारत से आई है, जहां से पुजारी वेंकटाचार्य ने वेंकटेश मंदिर में इसकी शुरुआत की थी। वर्तमान में, पाली के लगभग 50 मंदिरों में अन्नकूट का आयोजन किया जाता है।
अन्नकूट का प्रसाद बनाने की प्रक्रिया में मौसमी सब्जियों, अनाज, फल और सूखे मेवों का उपयोग किया जाता है। हलवाई कमल किशोर शर्मा के अनुसार, 100 किलोग्राम चावल से लगभग 800 किलोग्राम अन्नकूट तैयार किया जाता है। अन्नकूट को ‘इम्यूनिटी बूस्टर’ कहा जाता है, क्योंकि यह सर्दी और मौसमी बीमारियों से बचाने में मददगार माना जाता है।
डॉक्टर शिवकुमार शर्मा ने बताया कि कार्तिक माह में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है, और ऐसे में अन्नकूट का सेवन फायदेमंद हो सकता है। अन्नकूट महोत्सव का धार्मिक महत्व भी है, जो श्रीमद्भागवत महापुराण से जुड़ा हुआ है।
इस महोत्सव का आयोजन गोवर्धन पूजा से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक किया जाता है। पाली के विभिन्न मंदिरों में इस अवसर पर श्रद्धालुओं को अन्नकूट का प्रसाद वितरित किया जाता है, जिससे स्थानीय समाज की एकता और धार्मिक भावना को बढ़ावा मिलता है।
Tags: अन्नकूट, पाली, धार्मिक परंपरा, भारतीय संस्कृति, गोवर्धन पूजा, इम्यूनिटी बूस्टर

